चांद के साथ

 



युं तो हमारे जिंदगी मे अंत जैसा कुछ नही ....
एक ओट होता है जिसके अंधेरे मे सब छिप जाता है
हमारा होना भी कभी कभी......
मैने इसे जाना और समझा ...रोज उगते अपने छत से निकलते सूरज से....जो एक क्षितिज एक कोने से लालिमा लिए हुए निकलता जो सृजन था उसका....
सांझ के दिए के बाद वो चला जाता
एक ओट मे.... बहुत ढ़ुढ़ने के बाद भी उसे लंबे आकाश मे छोटे सितारे तो दिखते पर वो नही....
जिज्ञासा होती देख... कहां जाता है....
फिर बड़े होने के बाद ये अनुभव जीवन के आकाश मे भी हुआ...कभी उगे -कभी छिपे....

बोध होने के साथ साथ इतना तो हम समझ गये
हम मानवी थे प्रकृति के सबसे प्रिय
हम शायद ...वो सृजक थी और हमारी मां भी....
मां के आंख मे सदा संतान का ही चित्र बनता है
उसने हमेशा सीखाना चाहा हमे.....
हर घटना को घटित करा.....
कुछ अंत कौतूहल छोड़ अकेला कर जाते है
हम सबकुछ खो स्वयं को खोजने लगते है सृजन के लिए...एक चीज को कितनी बार सोचते है.. कुछ सृजन की कोपले फूटती है कुछ शिकायते उठती है
...समय भी वही होता है ,ये आकाश वो मेरा प्यारा सूरज भी...और मै भी....
बस अब हम एक किवाड़ मे लगे तख्ती से छिप जानने पहचानने लगते है....ये अबूझ होता है.. जहां हमारी मुट्ठी खाली ही रहती है....हम सीखना ,सूनना नही चाहते उस सच को....
अंत की पीड़ा होती ही भयावह है..प्रकृति का नियम स्वयं पर भी लागू करती है और हम पर भी..
हम स्वयं को नही बचा पाते...प्रयास भी नही करते...
वो बस हो जाती है...सृजन के दरम्यान नष्ट भी होता है एवं विस्फोट भी...मुहायना भी करते है और सहयोग भी... लेकिन नही लेते
क्योकि प्रकृति सीखा दी होती है...भूगोल के कक्षा मे की...लावा कैसे निकलता है और ज्वालामुखी कैसे फूटती है...वर्षो के उस ज्वालामुखी की फटना
सृजन करता है एक ....
सृजन की पीड़ा भयावह ही होती है..चाहे हमारा सृजन ही क्यो न हो...जिसे एक प्रसुती मां ने झेला था..एक डॉक्टर ने जदोहद की हमारे सुरक्षा के लिए...
मायने रखता है बस सृजन स्वयं का....
गर्भमुक्त मां के आंख के किसी कोने के ख़ुशी के आंसू
और थिरकता संतृप्त हंसी.....
रात का आकाश होता है एक सृजन
हमारे हंसने और रोने से....
आगे बढ़ने से......
आरंभ स्वयं का...



©भार्गवी