प्रेम में एकनिष्ठ पुरुष


 प्रेम मे जी रहा एकनिष्ठ पुरूष

द्वेष करता है प्रियतमा के तन पर अलंकृत 

आभूषणों से

जो आलिंगन कर रहे श्रृंगार के बहाने

वो बनाना चाहता है गले का हार 

अपने दोनो हाथों है बहुपाश बनाकर


एकनिष्ठ पुरूष देखना 

चाहता अपने प्रिय को सर पर रखे 

दुप्पटे मे 

वो प्रतिस्पर्धा करता सूरज से 

कहीं सूरज की किरणें

आकर स्पर्श न करले माथे के टिके को

जो अधिकार बस उसको है


एकनिष्ठ पुरूष प्रेम मे

भय खाता है रक्तजवा के पुष्पों से

की कहीं ये पुष्प लाल महावर बन 

चूम न ले प्रिय के चरणों को

जिसे उसने नही चूमा प्रिय के 

स्नेहिल रोष के भय से


एकनिष्ठ पुरूष प्रेम मे छलिया कृष्ण नही बनते

वो बन जाता है पुरूषोत्तमराम 

जैसे राम,सिया पर जयंत की

 दृष्टि गड़ाएं

जाने पर फोड़ डालते है उसके दोनो नेत्र

वैसे ही बचाते है हर कुदृष्टि से 


एकनिष्ठ पुरूष प्रेम के नाम पर 

प्रदर्शनी नही लगाता अपने प्रिय का

प्रेम प्रतीक चिन्हों से  

 उपमा नही डालता सौंदर्य का

वो बन जाता है  कर्ण का 

सुरक्षा कवच कुंडल

और हमेशा ओट मे रखता है अपने प्राण के



©-श्रीऋ भार्गवी