बेटियां


 


बेटियाँ बड़ी प्यारी होती हैं 

मानसिक रूप से हमें ऐसा परिवेश मिला है पीढ़ी दर पीढ़ी की हम जन्मते बच्चियों को वो स्थान नही सौंप पाते है जिनकी वो सचमुच स्थान रखती है..

पूर्व मे वजह ये रहा मांओ के साथ की जिनकी पुत्रियां अधिक होती उनको हेय दृष्टि से देखा जाता था ताने व व्यंग्य का सामना भी करना पड़ता

समय के साथ ये प्रथा तो मृत होने को है लेकिन हम आज भी उस मानसिकता से नही ऊबर पायें है

दुख होता है जब शिक्षित स्त्रियां भी जन्मकालिक वरीयता पुत्र को देती है..

बेटी के जन्म पर सबसे अधिक खुश होता है बेटी का पिता..ये सामान्यतः देखने को विदित होता है कि हास्पीटल में अक्सर बेटियों के जन्म पर अगर मांएं सामाजिक ताना बाना के भयाक्रांत हो रोती है तो अक्सर मांओ के कंधे पर बेटियों के पिता का हाथ का स्पर्श होता है ...ये कहते हुए कि "रे पगली तू रो काहे रही है रे ,ये तो मेरे भाग्य से जन्मी है,तुमको कमा के  पोसना है कि हमको? ,लक्ष्मी है मेरी 

देखना कैसे अफसर बनाएंगे  और शायद ये प्रथम साथ बेटियों को उनके पिता से मिलने के कारण ही बेटियां बाप को देवता से कम नहीं आंकती ऋणी जो होती है ..

बेटियों को  अहसास जन्म देते वक्त जो कमतर पड़ता है वो अनुभुति उसके बालों को उसके पसंदीदा चोटी बनाते वक्त होता है,उसके लिए फ्राक सिलते वक्त 

और उसे पहली रोटी गोल बनाना सीखाते वक्त हो

ये एक मां की पाठशाला होती है जहां वो गणित का वृत रोटियों पर बनाना सीखती है और त्रिभुज आलू के तिकोने टुकड़े में त्रिभुज का क्षेत्रफल और बेलन से आधार व उंचाई और एक दिन माप देती है अंतरिक्ष ...  दिल के एक  कोने मे रखती है अपने पिता से सीखी हुई सबको एकाकार चलने कि भावना और स्वाभिमान से जीने की कला

पापा के देर रात आने पर मां के इंतजार से नेह सीखती है एवं मां के पिता के बाद खाने से समर्पण

दोगुनी जिम्मेदारी व दोगुनी शिक्षा के साथ बलवती होती है

बेटियां सबसे अधिक मां पर हक जताती है,उनसे ही शिकायतें भी रखती है और नेह पिता के हिस्से देती है

पिता वो संबंध होता है जो लड़कियों के आंखो मे उसके पति व प्रेमी से अधिक बसता है

जीवनसाथी से अपार नेह मिले लेकिन शरीर ससुराल मे शरीर तो मन मायके मे ही छोड़ आती है लड़कियां मायके के उस उंची डेहरी पर 

दादी से कभी किसी बात पर डांट सूनते हुए सीखती है अनुशासन और स्त्रियों का चाल चलन जो कहते हुए सीखाती है "बेटी दाल के हल्दी होती है,उनके बिना घर बेरंग होता है...

बाबा(दादा) से खेतो का हिसाब और अंकगणित के मूल्य और बाजार के भाव के सवाल जहां वो अक्सर फेल ही होती है क्योंकि वो तजुर्बे का गणित ,किताबो के गणित से भारी होता है और पहली बार पैसो को गिनना और संभालना बाबा सीखाते है 

और इसतरह साहित्य, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाजशास्त्र, गणित , मनोविज्ञान ,धर्म विज्ञान बेटियां  बस प्यार प्यार मे सीख जाती है और कब बड़ी हो जाती है पता भी नही चलता क्योकि होती तो चपला का अवतार ही न जो स्थिर रहने को बनी ही नही...

सबसे कठिन होता है पिता के लिए अपने अंशिका को किसी दूजे घर सौंपना ,एक बाप ,उतने अपने पिता के मुखाग्नि देते वक्त भी नही बिलखा होता जितना वो बेटी को विदा कर बिलखता है

ऐसा लगता है उस घर से सारा धन लूट गया हो और वो दुनिया का सबसे गरीब इंसान है

ससुराल जाते समय माँ से रोते हुए कहती हैं...माँ पिताजी जी का ख्याल रखना जबकि ऐसा नहीं है कि ख्याल वहीं रखती है....उनका सारा समान सजा दिया हैं, दवा अलमारी रखी हुई हैं,दवा कब कैसे खानी है कागज पर लिखा हैं. सारे लोगों के नंबर नोट कर दिया हैं ठीक हैं माँ

उसवक्त भी एक बेटी उस घर के छोह मे होती है

भाईयों और बहनों के उस पवित्र डोर से बिछड़ वो लाख महलो मे जाये लेकिन हर तीज त्योहार घर के पास आये रास्तों पर ताकती है भाईयो व पिता के आने के पदचाप ऐसे नही है उसे कमी हैं

लेकिन एक पिता और भाई की कमी धन नही पूरा करता वो ससुराल आने के बाद समझती है वो

आज भी पिता के बुआ के विदाई के वक्त वो सारी पसंद की देते देखना और उनका मायके के लिए बिलख उठना यही अनुभव कराता है कि बेटियो की उम्र नही होती है वो तो मायके (घर )के लिए बस बेटी होती है ,चाहे वो कितना ही सुखी क्यो न हो उसके मायका उसके ससुराल से हमेशा सौगुना अमीर होता है उनके लिए शायद इसलिेए भी कि वो घर बेटियां का होता है जहां से उनकी स्मृति कभी नही विदा हो पाती मन पीछे छुट जाता है और शरीर ससुराल जा बसता है...

एक पक्ष ये नकारात्मक है कि लड़कियों को दबना सीखाया जाता है और अच्छा दिखने का मानसिक दवाब थोपा जाता है जो सर्वथा अनुचित है मानसिक विकास के दृष्टिकोण से

लड़कियों, अच्छी हो तो बनी रहो, बुरी हो तब भी बनी रहो पर मत लादना कभी ख़ुद पर बहुत अच्छी होने का बेतुका, अनचाहा बोझ। ये बोझ सोख लेगा धीरे-धीरे तुम्हारे अंदर की ऊष्मा और एक दिन बिना कोई शिकायत किए दम घुटने से हो जाएगी तुम्हारी मौत

बेटी हो बस बेटी बनी रहो❤️


©श्रीऋ भार्गवी