स्त्रीत्व पर आघात

 



स्त्रीत्व पर

 आघात पश्चात स्त्री 

महज स्त्री शेष नहीं बचती 

वो हो जाती है स्त्री व पुरुष संयुक्त

 तथा निर्देशित करने

 लगती अपना जीवन चक्र

 उभरने लगती है उसके अंदर 

ब्रह्मांड की नायिका ... 

सृष्टि सृजनिका प्रमाणित 

करने लगती है अपने अस्तित्व का उद्गम , 

अपने जीवित होके भी

 न होने का रहस्य की मांग , 

ध्वस्त करने लगती है कलुषित लोलुपता का दम्भ , 

स्वार्थी पौरुष का चक्रण । 

अतएव ध्यान रहे सदैव , 

सृष्टिकर्ता भी स्त्रैण ऊर्जा 

बगैर शवसदृश अस्तित्वहीन है ..

 सनद आप का अस्तित्व स्त्री से है

 एक स्त्री का आपसे नहीं ...



©--श्रीऋ भार्गवी