विकट युद्ध


 


जब इतिहास मे कहीं धर्म युद्ध 

का उल्लेख होगा 

किसी पन्ने मे अंकित मिलेगा 

मेरे जीवन का वो विकटयुद्ध भी

जो मैं अपने जीवन मे अभिमन्यु होकर 

लड़ी थी अकेले चक्रव्यूह में

जिसमें वीरगति पाने के बजाय मिली थी गति अस्तित्व की

व्यूहो मे घिरने पर अंतिम सत्य न मानकर

भी यही दिखा कि युद्ध दो पक्षों का का न होकर 

स्वयं से ही स्वयं के इस वर्तमान मे होने

के विरुद्ध होता था

उन काले दिनो में जहां दिखते सब 

एक ही मुखौटा लगाये परिचय ये कहते हुए कि हम तुम्हारे अपने है 

जबकि मैं इस सत्य से भी पुर्ण रूप से अनभिज्ञ थी कि मैं विश्वास कर सकूं उनके

 इस कहे पर भी

साक्ष्य बस इतना था कि जन्म से ही इर्द-गिर्द पाती

सत्य की वो पुरातन खोज बस मेरी न थी

मेरे पूर्व भी भटकते मिली 

मेरी मां 

मेरी दादी 

व मेरे ही जैसी कितनी ही स्त्रीयां

जो ठीक से स्त्री ‌होने के अधिकार से भी वंचित रही 

ज़ख्मों के छिद्रों में लंबे

 समय से दफन भावानुवाद 

कूद पड़ती महासमर में जब जब अपनी आहूति को

चक्रव्यूह में फंसी वो 

विद्रोही स्त्री आत्माएं 

तब तब वो चक्रवर्ती बनती अपने समर में





©श्रीऋ भार्गवी