बस यूंही
मैं हरबार रो पड़ती
जब देखती किसी बुढ़े के साथ
उसके रोटी के कौर के बंटवारे को
अनायास एक विरक्ति छा जाती
मेरे मानसिक पटल पर
जहां सब परिभाषित करते ये
दुनिया सात रंगों से बनी है
लेकिन मुझे हर बार सिर्फ दो रंग
नज़र आते इस अंधेर नगरी में
एक "सुख का रंग"
दूजा जो उस बुढ़े दंपति के घाट के
नीचे आया "दुख का रंग"
मुझे चीर डालती हर बार
किसी बचपने के अधिकारी बच्चे
से उसका बचपना छीन लेना
मन संशय में भर जाता
जब सूनती कि दुनिया सिर्फ मांओ और
उनके संतानो के प्रेम से बनी हैं
जिज्ञासाओं के प्रश्न चीर डालते
मन के कोने कोने को
जब सफलता को सरलता खोते देखती
जटिलताओं का जाल दौडता जकड़ने को
मुझे दुनिया के दुनिया बनने
से रोकने को पकड़ लेता एक शिशु
जैसे खींचता कोई दुधमुंहा
मां को आंचल के कोर को पकड़
©--भार्गवी श्रीऋ
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