भारतीय समाज की पुरूष संस्कृति 💙
सृष्टि जब रची गयी तब संभवतः पुरूषों की सृजन पर ईश्वर के हाथ का दाब अधिक रहा होगा जो आज भी उनके जीवन मे स्थायित्व लिए हुए है
पुरूष इस सृष्टि का वो प्राणी है जो केंद्र मे तो रहा लेकिन उसपे पूरे सृष्टि का भार थमा उसके जीवन को नीरसता का बीज बो दिया गया और पुनः असंतुलन हो पुरुष के मन मस्तिष्क के मध्य द्वंद जन्म लेने लगा
एक मां जो मानसिक दबाव वहन करती है पुत्रोत्पति हेतु वो दाब कहीं न कहीं मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता उस पुरुष जीव के रूप मे जिसे सृष्टि के बशींदे प्रथम रूदन के साथ ही पुत्र की संज्ञा देंगें
हालांकि वो नन्हा सा कोमल बच्चा ईश्वर हेतु उसका अंश मात्र है आमतौर पर पुत्रो के जन्म दिवस के साथ ही सोहर गीत के माध्यम और अन्य माध्यमों से जिम्मेदारी के गीत उसके जीवन मे घोले जाने लगता हैं,वो अदना सा नन्हा जीव जब पुरुष बनता है युवा होता है तब महसूस करता है तो यही पाता है कि उसके हर श्वास मे जिम्मेदारी है और वो हर सांस बोझ है...जन्म लेते ही उसे एक सूत्र दे दिया जाता है" मर्द को दर्द नही होता या मर्द रोते नही" अरे भाई मर्द भी मनुष्य ही है उसे दर्द तो होना ही चाहिए तभी तो औरो का भी दर्द समझेगा हमारे समाज मे नियम तो बने लेकिन किसी भी नियम का दुरूपयोग भी सबसे पहले हुआ
भारत के कई हिस्सों में एक भेदभाव आज भी है स्त्रियों को दबाकर रखने का भेदभाव जो पुरूषों को पीढ़ी दर पीढ़ी बीजारोपण किया गया लेकिन कहीं न कहीं ये कमजोर मस्तिष्क की ही उपज मात्र है
पुरूष सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच फंस अब जीव से अधिक कठपुतली हो चुका है अस्तित्व से ओझल उसे ये नही पता है कि पुरुष होता क्या है? लेकिन समाज ने जो उसे पुरुष महाराज की घोषणा की है उसका ही थाली पीट रहा कि हम पुरूष है और अस्तित्व से दूर होना ही पुरुष को पुरूष नही बचने देता , स्त्रियों को तो वरदान है वो रो भी सकती है पुरूषों को जहां ये अभिशाप है कि रोना मना है स्त्रियों को जहां ये सहानुभूति मिली की वो स्वंतत्रता से वंचित है लेकिन पुरूषों के साथ भी ठीक वही अन्याय हुआ उन्हें स्वंतत्रता तो दी गयी लेकिन जिम्मेदारी के बेड़ियों के साथ जहां वो जीना भी चाहे तो सोच सोचकर जी पाता है हमारे मध्यवर्गीय समाज मे हाल ये है कि बीस साल के उम्र पार करते युवा अपना अस्तित्व भूल जाता है
उसे परीक्षाओं के तैयारी के जोड़ घटाव के साथ साथ ये भी सोचना पड़ता है कि बहन का विवाह मे खर्च कितना आयेगा और हम कबतक सरकारी नौकरी हासिल कर लेंगे की बहनें सुखी घर जायें
मां अस्वस्थ रहती है तो उनके लिए शहर से दवाएं लानी है इसलिए अपनें खर्चों मे कटौती करता है
लेकिन फिर भी उसे समाज एक दरिंदे के रूप मे देखेगा...मानते है पुरुष क्रोधी हुआ,उसमे सहनशीलता नही बचा लेकिन उसने स्वयं तो नही त्याग किया इसका कहीं न कहीं पुरूष के भीतर जो स्त्रीत्व था उसे मृत किया गया उसपर जिम्मेदारियों के बोझ डालकर सर्वप्रथम घरों में शुरुआत जन्म से ही होती है इससे कि तुम लड़के हो तुम्हे अपनी बहनों रक्षा करनी है
कुछ तो रहम करो जो खुद अभी जो बच्चा है वो रक्षा भी नही समझता उसे रट्टू तोते की रटा दिया गया
कि तुमको पैसा कमाना है,लड़का जात के हो लड़का की तरह फिटम फिट रहना है कुछ बड़ा होते ये कान मे गीत बजने लगता है मिश्राजी का लड़का आईआईटी मे दाखिला लिया है देख लो और तुम नालायक फोन मे आंख गड़ाये रह रहे हो भीख ना मिलेगी मांगोगे तो ,ये सीख तो हमारे समाज की सार्वजनिक सीख है जिसको शायद संविधान मे भी स्थान मिलना चाहिए था किसी भी लड़की से दूर रहना है और दुनिया की सारी लड़कियां तुम्हारी बहने है खासकर महुल्ले की वो अलग बात है कि लड़का घोषित नालायक सबमें राधा ही ढ़ुढ़ने लगता है लेकिन यहां भी पुरूषों का फार्मूला लग ही जाता है साहब राधा तो बना लिए लेकिन रूक्मिणी बनाने का हिम्मत मे पुरूष महाराज बनने के चक्कर में नही कर पाते काहे कि वो पुरूष है उनपर समाज को ढोने का जिम्मेदारी मिला है , पिताजी ना मनायेंगे ,अम्मा मुंह फुलायेगी और सबसे बड़ी दुर्दशा तो तब हो जाती है जब राधिका जी नारीवादी हो जाती है और अन्याय और धोखे की शायरी लगती है काॅपी पेस्ट मारने
पुरूष यहां भी अभिशप्त ही रह जाता है और उसके मनोभावों पर पुनः स्थापित होता है बस जिम्मेदारी
सरकारी नौकरी सूर्यदेव की कृपा से मिल भी गयी तो परिवार और स्वयं के द्वंद्व से लड़ता वो पुरूष दिन तो यार दोस्तों मे बतियाते हुए काट लेता है लेकिन शाम दुनिया मे उस टापू पर बसे शहर की तरह अकेला पाता है जहां उसे अपनी ही सांसो से दम घूटता है
उसे जरूरत होती है एक कोमल स्पर्श की , जहां वो सून सके इस लड़ाई में तुम अकेले नही हो ये समय स्त्री का स्त्रीयों के हित मे लड़ने का नही है और ना पुरूष का पुरूषों ,समय है स्त्रियों का पुरूष को हित मे और पुरुषों के स्त्रियों के हित मे होने का ,वरना पुरूष और स्त्री बस कुठपुतलियों के नाच मे नाचनेवाले खिलौने से अधिक कुछ शेष ना रहेगे ना स्त्री ही स्त्री रहेगी और ना पुरूषों में पुरूष शेष..पुरूष जो अभिशप्त हो जी रहे उसे सृजनशीलता की आवश्यकता है जिससे वो जी सके, पुरुष बाहर जाने के लिए ही नही हैं कि ज़िम्मेदार हो निकल पड़ा घर से दूर अंजान शहर मे अपने जिम्मेदारियों को अंजाम देने वो घर लौटने को भी है ये बात याद रखना जरूरी है उसे घर में भी शामिल करें उसे शहर के गोद मे अकेले ना छोड़ दे भटकने को
जबतक उन्हें संवेदनाएं नही मिलेगी वो भी संवेदना नही समझेंगे बचेंगे तो बस इस शहर से उस शहर भागता एक मालगाड़ी जिसपर सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ भर रखा गया है
- मनुष्यता से साक्षात्कार करायें ,जीना सीखायें
Post a Comment