अपरिभाषित नेह❤️

 



याद है तुमको हर बच्चे की तरह तुम रोये नही थे पगले ,भले ही तम अब मेरे एक डांट पर गंगा यमुना बहाने लगता है जैसे गंगोत्री तुम्हारे खरगोश वाले आंखो मे ही बसती है

तुम प्रथम बार धरती पर आते ही रूदन के ध्वनि मे ही मंत्रोच्चारण किये थे और जानते हो उसमे मेरा नाम रहा था...तुम हमारे ध्यान मे ही थे गर्भ मे इसलिए तो  मुखमंडल पर मेरी छाप आ गयी और विचारशक्ति का प्रवाह भी ..तुम हमसे एक नक्षत्र ही पूर्व जन्म लिए उतरभद्रापदा मे एक राशि का होकर एक माह पश्चात, तुम ईश्वर के प्रभात पूजन मै संध्या पूजन के बेला मे...

हम अग्निस़ोमात्मक जगत उस अन्नत कालीन कालचक्र के सहयात्री है जिसे गंतव्य तक जाने के लिए सितारों और ग्रहो के साथ खेलते हुए जाना है लेकिन ठीक आकाशगंगा के ध्रूव तारे की दिशा मे जो संकल्पशक्ति का देव है जो अपने जगह से डिगता नही...

मै स्त्री की आंख से तुमको देखी ,तब सबकुछ से परे जानकर मै तुम्हारी अच्छाई देख सकी,उनमे बड़प्पन देख पायी...जानते हो तुम, मै दूर थी इसी कारण से तो देख सकी तुम्हारे उस असाधारण प्रकाश को जो नजदीक से नही दिखता..तुम साधारण से जकड़े हुए थे इसे बस खींच हटा दी...

तुम्हे पता है मैने कन्याकुमारी के लहरो से आये  कितने सीपों मे से तुम्हारे लिए एक काला सफेद सा सीपी चुनी जिसमे एक मोती मिला था जिसे देख तुम कहे थे ये काला होता तो ठीक तुम्हारे नाक के पास के तिल जैसा होता जो कभी कभी तुम्हारे उस ज्वालामुखी वाले गुस्से से लाल तिल मे बदल जाता है ...पता है शकुन शास्त्र मे वो तिल स्नेहमयी होने का चिन्ह है जिसे तुम ढुंढ़ मानते हो कि जैसे कोलमब्स  के लिए अमेरिका , आर्यभट्ट के लिए शून्य वैसे ही तुम्हारे लिए वो निराकार तिल जो समय के साथ गाढ़ापन लिये जा रहा...

तुम सदैव मुस्कारते रहो हमेशा अपने नाम पर के चन्द्र बिंदु की तरह और मैं कवच बने रहूंगी रेफ बन ढके उस चंद्र बिंदु को❤️



©--भार्गवी श्रीऋ